
समाज : हैसियत के हाशिये पर – पीयूष जांगिड़
बढ़ती प्रतियोगिता और समाज की नज़र पर आलेख।
मानव जीवन इस विश्व मे आज सफलताओं और असफलताओं के तराजू पर एक नग्न मांस का टुकड़ा बन गया है। इसे एक सौदागर तौलता है तो दूसरा इसे ख़रीदकर नोचना चाहता है। क्या मानवता का जन्म एक दूसरे से प्रतियोगिता के लिए हुआ था या सहयोग के लिए? – ये वो सवाल है जिसने पूरे फिलोसोफी विषय को जन्म दिया हो शायद।
मेरे इस विचारों के दिशाविहीन प्रवाह का कारण ये प्रतियोगिता ही है। हर वक़्त हर चीज में तुलना! और करता भी कौन हैं, वो विश्व जिसकी एक मात्र उपलब्धि ये है कि वो आपको सुना सकता है, तौल सकता है और तिरस्कार के हवन कुंड में आहूत कर सकता है। विषय से भटकाव आपको अटपटा लग रहा है और मुझे स्वभाविक ,चूँकि मेरा विषय ही ये जीवन मे व्याप्त भटकाव है। क्यों एक पुरुष होकर हमारे जीवन की परिपाटी हमारे गुण नही अपितु केवल अन्य पुरुष से तुलना है। क्या पौरुषत्व का अर्थ हिंदी भाषा में सोना या धन रहा होगा
या लोग साहस, निष्ठा और सज्जनता शब्दो को अपनी स्कूल की हिंदी की कॉपियों में लिखकर भूल गए है। खेर इंग्लिश मीडियम के जमाने मे देशी विचारो कहाँ इस अगरबती की रोशनी मे मिलेंगे।
मेरा कथन यही है जो हम लोगो के एक एक्स मित्र का था ।
“पैसा बहुत कुछ है परंतु वह सब कुछ नही है”। अंततः मुझे एक कायर और असफल व्यक्ति की उपाधि के अलावा इस निबन्ध से कुछ नही मिलने वाला। परन्तु समाज की अपेक्षाएं तभी स्वीकार्य होनी चाहिए न जब समाज के ठेकेदार हम जैसे कायर शेर हो न कि मुँहफट गधे जो शौर्य का परिणाम देखे न कि पागलो की तरह मेहनत करने वाले को उच्च पदों पे आसीन कर दे।
और हाँ गधो के जिस तरह आगे प्रलोभन पर बन्धी खींचती डोर नही दिखती, वो चलता जाता है। उसी तरह हमारे माननीय तुलनाकारो को ये नही दिखता की ये जिसे सफलता समझते है वह कठपुतली है जिसकी डोर हरामनगरी चिचा के हाथ मे और जिसका कारपेंटर अंधा मेहनती है।

विचार – एड. पीयूष जांगिड़
पुरानी गजनेर रोड़, बीकानेर।
मोबाइल – 9460875381




