बीकानेर

गोवर्धन-प्रसङ्ग : एक सामान्य शिलाखंड से गिरिराज बनने की कहानी

गोवर्धन-प्रसङ्ग : एक सामान्य शिलाखंड से गिरिराज बनने की कहानी

बड़े-बुजुर्गों से सदैव सुना है कि भगवान भी तभी साथ देते है जब मानव प्रयास पूरे मन से किए जाए। अर्थात यह माना जा सकता है की सब कुछ दैवीय नहीं होता उसमे बहुत कुछ मानवीय चेष्टाएँ ही होती है। इसीलिए गीता में कृष्ण स्वयं कहते है :- ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।’ ये कर्म करने की जो प्रेरणा है वहीं मानवीय अधिकार में है। इसी से जुड़ी एक कहानी है ’गोवर्धन पर्वत की कहानी।

कथा के अनुसार, एक बार ऋषि पुलस्त्य गिरिराज पर्वत के पास से गुजर रहे थे, तभी उनको इसकी खूबसूरती इतनी पसंद आई की वे मंत्रमुग्ध हो गए। ऋषि पुलस्त्य ने द्रोणांचल पर्वत से निवेदन किया मैं काशी में रहता हूं आप अपने पुत्र गोवर्धन को मुझे दे दीजिए। मैं उसको काशी में स्थापित करूंगा और वहीं रहकर पूजा करूंगा।

द्रोणांचल पुत्र मोह से दुखी हो रहे थे लेकिन गोवर्धन ने कहा कि हे महात्मा मैं आपके साथ चलूंगा लेकिन मेरी एक शर्त है। शर्त यह है कि आप मुझे सबसे पहले जहां भी रख देंगे, मैं वहीं स्थापित हो जाउंगा। पुलस्त्य ने गोवर्धन की शर्त को मान ली। तब गोवर्धन ने ऋषि से कहा कि मैं दो योजन ऊंचा और पांच योजन चौड़ा हूं, आप मुझे काशी कैसे लेकर जाएंगे। तब ऋषि ने कहा कि मैं अपने तपोबल के माध्यम से तुमको अपनी हथेली पर उठाकर ले जाउंगा।

रास्ते में ब्रज आया, तब गोवर्धन पर्वत को याद आया कि यहां पर भगवान कृष्ण अपने बाल्यकाल में लीला कर रहे हैं। यह सोचकर गोवर्धन पर्वत ऋषि के हाथों में अपना भार बढ़ाने लगे, जिससे ऋषि ने आराम और साधना के लिए पर्वत को नीचे रख दिया। ऋषि पुलस्त्य यह बात भूल गए थे कि उन्हें गोवर्धन पर्वत को कहीं पर भी रखना नहीं है।

साधना के बाद ऋषि ने पर्वत को उठाने की बहुत कोशिश की लेकिन पर्वत हिला तक नहीं। इससे ऋषि पुलस्त्य बहुत क्रोधित हो गए और उन्होंने शाप दे दिया कि तुमने मेरे मनोरथ को पूर्ण नहीं होने दिया इसलिए अब हर रोज तिल भर तुम्हारा क्षरण होता रहेगा। माना जाता है कि उसी समय से गिरिराज पर्वत हर रोज घट रहे हैं और कलयुग के अंत तक पूरी तरह विलीन हो जाएंगे।

इस श्राप से गोवर्धन विगलित होकर मुनि से क्षमा याचना करने लगे। मुनि का क्रोध अब तक शांत हो चुका था। उन्होंने गोवर्धन को वरदान दिया कि द्वापर युग श्री-कृष्ण अपनी कनिष्ठा पर तुम्हें धारण कर तुम्हे युगों-युगों के लिए पूजनीय बना देंगे।

कथा से सीख

किसी बड़े के घर पैदा होने से आप बड़े नहीं बन जाते। उस विशिष्टता को तो हर व्यक्ति को अपने कर्म व योग्यता से ही अर्जित पड़ता है। गोवर्धन द्रोणाचल पर्वत के पुत्र थे। पर्वत-सम्राज्य के युवराज थे परन्तु अपने पिता के वचनों की रक्षा के लिए जिस प्रकार राम ने क्षण में अयोध्या को त्याग वन-गमन कर लिया उसी प्रकार गोवर्धन ने भी पुलत्स्य मुनि को दिए अपने पिता के वचनों की रक्षा के लिए उनके साथ जाने के लिए तुरन्त राजी हो गए। अंत मे श्री कृष्ण द्वारा धारण करने के कारण पूजनीय हो गए। हमें भी अपने जीवन में त्याग-धर्म को निभाना चाहिए। क्योंकि ‘त्यागे से आगे मिले’।

पूरी कहानी को कविता के माध्यम से सुनिए :-

आनंद कुमार पुरोहित(मस्ताना)

निदेशक

स्टूडेंट सॉल्यूशन क्लासेज

8562815057

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