टाइम्स ऑफ़ समाचार,बीकानेर।
आयुर्वेद का मुख्य प्रयोजन स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा करना तथा रोगी मनुष्य के रोग की चिकित्सा करना है। इस प्रयोजन की सम्पूर्ति हेतु आचार्यो ने दिनचर्या,
रात्रिचर्या, ऋतुचर्या का विधान बताया है। आयुर्वेद में काल को वर्षा, शरद, हेमन्त, शिशिर,बसन्त, ग्रीष्म इन छः ऋतुओं में बाँटा गया है।
वर्षा-ऋतु में आहार-विहार
वर्षा-ऋतु विसर्ग काल के आरम्भ में आती है। इस समय आकाश और दिशाएँ बादलों से युक्त होती है। वातावरण में हरियाली के साथ-साथ नमी और रूक्षता भरी होती है। नमी के कारण मच्छर-मक्खी आदि जन्तुओं से गन्दगी बढ़ जाती है।
शरीर पर प्रभाव
वातावरण की नमी का प्रभाव शरीर पर भी पड़ता है। ग्रीष्म-ऋतु में पाचन-शक्ति पहले से ही दुर्बल होती है। वर्षा-ऋतु की नमी से वात-दोष कुपित हो जाता है और पाचन-शक्ति अधिक दुर्बल हो जाती है। वर्षा की बौछारों से पृथ्वी से निकलने वाली गैस, अम्लता की अधिकता, धूल और धुएँ से युक्त वात का प्रभाव भी पाचन-शक्ति पर पड़ता है। बीच-बीच में बारिश न होने से सूर्य की गर्मी बढ़ जाती है। इससे शरीर में पित्त दोष जमा होने लगता है। गेहूं, चावल आदि धान्यों की शक्ति भी कम हो जाती है।
इन सब कारणों से व संक्रमण से मलेरिया और फाइलेरिया बुखार, जुकाम, दस्त (आम से युक्त), पेचिश, हैजा, आत्रशोथ (colitis), अलसक, गठिया, सन्धियों में सूजन, उच्च रक्तचाप, फुंसियाँ, दाद, खुजली आदि अनेक रोग आक्रमण कर सकते हैं।
पथ्य आहार-विहार
वर्षा-ऋतु में हल्के, सुपाच्य, ताजे, गर्म और पाचक अग्नि को बढ़ाने वाले खाद्य-पदार्थों का सेवन हितकारक है। ऐसे पदार्थ लेने चाहिए, जो वात को शान्त करने वाले हों। इस दृष्टि से पुराना अनाज, जैसे गेहूँ, जौ, शालि और साठी चावल, मक्का (भुट्टा), सरसों, राई, खीरा, खिचड़ी, दही, मट्ठा, मूँग और अरहर की दाल, सब्जियों में – लौकी, भिण्डी, तोरई, टमाटर और पोदीना की चटनी, सब्जियों का सूप, फलों में – सेब, केला, अनार, नाशपाती, पके जामुन और पके देशी आम तथा घी व तेल से बने नमकीन पदार्थ उपयोगी रहते हैं। आम और दूध का सेवन विशेष रूप से लाभकारी है। आम पका, मीठा और ताजा ही होना चाहिए। कच्चा, खट्टा और पाल से उतरा हुआ आम लाभ के स्थान पर हानि करता है। पके आम को चूस कर ऊपर से दूध पीने से शरीर पुष्ट होता है। यदि एक समय भोजन के स्थान पर आम और दूध का उचित मात्रा में सेवन किया जाए, तो शरीर में ताकत, सुडौलता और पुष्टि आती है। इसी प्रकार पके (बिना दाग वाले) और गूदेदार थोड़े जामुनों का नियमित रूप से सेवन करने से त्वचा के रोग, फोड़े-फुंसियां, जलन और प्रमेह रोगों में लाभ होता है। भुट्टा खाने के बाद छाछ पीने से वह अच्छी तरह पच जाता है । दही की लस्सी में लौंग, त्रिकटु (सोंठ, पिप्पली और काली मिर्च), सेंधा नमक, अजवायन, काला नमक आदि डाल कर पीने से पाचन-शक्ति ठीक रहती है। लहसुन की चटनी व शहद को जल एवं अन्य पदार्थों (जो गर्म न हों), में मिला कर लेना उपयोगी है। इस मौसम में वात और कफ दोषों को शान्त करने के लिए कटु, अम्ल और क्षार पदार्थ लेने चाहिए। अम्ल, नमकीन और चिकनाई वाले पदार्थों का सेवन करने से वात दोष का शमन करने में सहायता मिलती है, विशेष रूप से उस समय जब अधिक वर्षा और आँधी से मौसम ठण्डा हो गया हो। रसायन रूप में हरड़ का चूर्ण सेंधा नमक मिला कर लेना चहिए।
इस ऋतु में जल की शुद्धि का विशेष ध्यान रखना चाहिए। वर्षा का उचित प्रकार से संगृहीत शुद्ध जल उपयोगी रहता है अथवा कुए के जल को उबाल कर ठण्डा करके पीना चाहिए। जल में तुलसी के कुछ पत्ते और फिटकरी (चावल के दाने के बराबर) पीस कर मिलाने से भी जल शुद्ध हो जाता है। आजकल वाटर फिल्टर आदि साधनों से भी जल शुद्ध कर लिया जाता है। यदि ठण्डे जल में शहद मिला लिया जाए तो और अच्छा है। शरीर पर उबटन मलना, मालिश और सिकाई करना लाभदायक है। वत्र साफ-सुथरे और हल्के पहनने चाहिए। भीगने पर तुरन्त वत्र बदल लेना चाहिए। ऐसे स्थान पर सोना चाहिए, जहाँ अधिक हवा और नमी न हो। भोजन भूख लगने पर और ठीक समय पर ही करना चाहिए। रात्रि को भोजन जल्दी कर लेना चाहिए। मच्छर आदि से बचने के लिए मच्छरदानी का प्रयोग करना चाहिए। घर के आस-पास के गड्ढों में जमा हुए और सड़ रहे पानी में मच्छर, मक्खियाँ आदि कीड़े बहुत पनपते हैं व रोग फैलाते हैं, अतः उनमें कीटनाशक छिड़क देना चाहिए। सफाई का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है।
डॉ सुधांशू व्यास
आयुर्वेद चिकित्सा अधिकारी
राजकीय आयुर्वेद चिकित्सालय
जवाहर नगर-बीकानेर




