
टाइम्स ऑफ़ समाचार,बीकानेर।
गुरु पूर्णिमा विशेष-
मानव जीवन समस्याओं का घेरा हैं, वह पूरे जीवन इन्हीं समस्याओं का उपाय खोजता रहता है। ऐसे समझिए कि वह सोया हुआ है पर जागना चाहता हैं। इस प्रकार जागने के लिए विभिन्न प्रकार के उपागमों की तलाश करता हैं। वह अपनी समस्याओं के हल के लिए किताबों को पढ़ता है पर किताबे उसके नियंत्रण में है वह जब चाहे उसे बंद कर सकता हैं। फिर वह जगने के लिए अलार्म लगाता है जिससे झुंझलाकर थोड़ा सा जागता है पर उसे भी हठात बन्द कर देता है। इस प्रकार न तो कोई किताब उसकी समस्याओं का हल बता सकीं और न ही कोई अलार्म उसे जगा सकीं। पता है क्यों? क्योंकि ये दोनों चीजें उसके नियंत्रण में है। तब ऐसे समय उसे गुरु की आवश्यकता होती है। गुरु वह जो आपके नियंत्रण के बाहर हो। गुरु वह है जो आपकी जिज्ञासाओं का शमन करता है व आपका रूपांतरण कर देता हैं। गुरु पूर्णतः भारतीय मूल का शब्द है जिसमें गु का अर्थ अंधकार और रु का अर्थ है प्रकाश। जो अंधकार से प्रकाश में ले जाये वो गुरु है। प्रायः यह मान लिया जाता है कि गुरु और शिक्षक एक ही है। परन्तु ऐसा नहीं है, इनमे स्पष्ट विभेद है। हालांकि शाब्दिक अर्थ देखा जाए तो गुरु और शिक्षक का एक ही होता है परन्तु दोनों में भावनात्मक अंतर होता है जैसे शिक्षक आपको जानकारी देता है वहीं गुरु आपका जागरण कर देता है। शिक्षक पुरानी पीढ़ी और नई पीढ़ी के बीच मे एक सेतु का काम करते है यदि वे नहीं हो तो ज्ञान की परम्परा को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता परन्तु वे केवल अपने पूर्वजों से प्राप्त जानकारी को आपको बता सकते है। गुरु अपने अनुभवों से प्राप्त ज्ञान को हमारे भीतर भर देता है। शिक्षक के ज्ञान में कुछ भी निजी नहीं होता और गुरु का ज्ञान उसका अपना नितांत निजी होता है। तभी तो कहा गया है कि –
निवर्तयत्यन्यजनं प्रमादतः स्वयं च निष्पापपथे प्रवर्तते।
गुणाति तत्त्वं हितमिच्छुरंगिनाम् शिवार्थिनां यः स गुरु र्निगद्यते।।
अर्थात जो दूसरों को प्रमाद करने से रोकते हैं, स्वयं निष्पाप रास्ते से चलते हैं, हित और कल्याण की कामना रखनेवाले को तत्त्वबोध करते हैं, उन्हें गुरु कहते हैं।
जब हम गुरु के पास जाते है तो वह हमें परिवर्तित कर देता है। हम वह नहीं रहते जो पहले थे। वहीं शिक्षक हमारे प्राप्त ज्ञान पर अपने ज्ञान का अतिव्यापन कर देता है। हम अपने को थोड़ा और अधिक भारी महसूस करने लगते है। वहीं गुरु हमें वह ज्ञान देता है जिससे हम विनयशील होते है विनय से गुरु सेवा का फल मिलता है, गुरु सेवा से आध्यत्मिक ज्ञान की प्राप्ति होती है, ज्ञान से चंचल मन को स्थायित्व प्राप्त होता है और इसी स्थायित्व से बन्धनों से मुक्ति अर्थात मोक्ष मिलता है ।
मोक्ष क्या है?
मोक्ष हमारे चार पुरुषार्थो (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) में अंतिम पुरषार्थ है। ये आगामी तीनो पुरुषार्थो का लक्ष्य भी है। ये मोक्ष केवल गुरु के समागम से ही सम्भव है। हमारी संस्कृति में गुरु के चरणों की वंदना की गई है परन्तु कुछ तथाकथित पश्चिम की धारणा वाले मित्रों का मानना है की जिससे ज्ञान प्राप्त करो उसके चरण-स्पर्श से क्या होगा? ये तो मस्तिष्क और मस्तिष्क का लेन-देन है। चरणों की क्या भूमिका है? सही बात है परन्तु उनका ये कथन केवल शिक्षकों तक ही उचित ठहरता है क्योंकि वे वहीं जानकारी देते है जो उनके मस्तिष्क में है अतः मस्तिष्क से मस्तिष्क का मिलन है परन्तु गुरु तो वह ज्ञान देता है जो उसके ह्र्दय में है उसे अपने मस्तिष्क में लेने के लिए ह्र्दयस्थल से नीचा तो होना ही पड़ेगा। इसीलिए-
अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्।
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः।।
गुरु और शिष्य परम्परा हमारी अपनी परंपरा है इसे जीवित रखना अब हम सब की प्रमुख जिम्मेदारी है। इसी परंपरा ने भारतीय चेतना को अब जीवित रखा है। जैसे क्रूर नंद वंश को समाप्त कर एक खुशहाल साम्राज्य की स्थापना करने वाले चाणक्य और चन्द्रगुप्त। जैसे एक समय भारत की सनातनी सँस्कृति के खंडहर महल को पुनः राजसी महल बनाने वाले आदि गुरु शंकराचार्य और उनके शिष्य। जैसे बंग-भंग करने वाले लार्ड कर्जन को आंख दिखाने वाले बालगंगाधर तिलक व उनके शिष्य या बौद्ध की अहिंसा को क्रांति का हथियार बनाने वाले गोपालकृष्ण गोखले और गांधी। इन सभी ने गुरु-शिष्य परम्परा का निर्वहन किया परन्तु आज के समाज में ये परम्परा धूमिल होती जा रही है। हर व्यक्ति को अपने जीवन मे एक गुरु की आवश्यकता होती है क्योकि जैसे दूध के बिना गाय, फूल के बिना लता, चरित्र के बिना पत्नी, कमल के बिना जल, शांति के बिना विद्या, और लोगों के बिना नगर शोभा नहीं देते, वैसे हि गुरु बिना शिष्य शोभा नहीं देता।
दुग्धेन धेनुः कुसुमेन वल्ली शीलेन भार्या कमलेन तोयम्।
गुरुं विना भाति न चैव शिष्यः शमेन विद्या नगरी जनेन।।
तो आइए इस पावन अवसर पर अपने गुरुदेव का स्मरण कर प्रर्थना करें हे गुरुवर! मुझे इतनी ताकत दे कि मैं अपने जीवन में आए सभी कष्टों का डटकर मुकाबला कर सकूं।
“जब भी मैं भटका राहों में सत्मार्ग दिखलाया है।
गुरु वंदन है अभिनंदन है, जो इतना मुझे सिखाया है।।(मस्ताना)
आनंद कुमार पुरोहित( मस्ताना )
निदेशक
स्टूडेंट सॉल्यूशन क्लासेज
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