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आज का बड़ा सवाल — क्या हम सच में बाल मनोविज्ञान को समझते हैं?

बच्चा भागा नहीं… भागी थी हमारी समझ!

आज का बड़ा सवाल — क्या हम सच में बाल मनोविज्ञान को समझते हैं?

आनंद कुमार पुरोहित ‘मस्ताना‘

कक्षा की खिड़की से झाँकता एक मासूम चेहरा… डर से भरी आँखें और काँपते होंठ। वजह? उस बच्चे के शिक्षक ने उसके माता-पिता के बारे में कुछ ऐसी बातें कही थीं जो किसी भी नन्हे मन को झकझोर दें। लगातार ताने, अपमान और भावनात्मक दबाव के बीच वह बच्चा घर छोड़कर भागने पर विवश हो गया।

ईश्वर की कृपा रही कि वह मिल गया, पर पीछे रह गया एक गूंजता सवाल — क्या आज के शिक्षक और माता-पिता बाल मनोविज्ञान को सच में समझते हैं?

आजकल शिक्षा का अर्थ केवल परीक्षा में अच्छे अंक लाना रह गया है। जो बच्चा जितने अच्छे अंक लाता है, वो स्कूल, कोचिंग और समाज के लिए एक संपत्ति है और जो पढ़ाई में थोड़ा कमज़ोर है उसे समझा जाता है भार। ये तो शिक्षा का कार्य नहीं था? शिक्षा का कार्य तो ऐसे बालक का निर्माण करना है, जो समाज के भविष्य को स्वर्णिम बना सके। शिक्षा का कार्य मनुष्य को समझना और आकार देना है। आज जब स्कूल और माता-पिता दोनों ‘परिणाम’ को ही लक्ष्य बना बैठे हैं, तो बच्चे की भावनाएँ कहीं पीछे छूट जाती हैं।

एक कठोर टिप्पणी, एक अनुचित तुलना, या बार-बार की डाँट — बच्चे के आत्मविश्वास को जड़ से हिला सकती है। जहाँ शिक्षक “सिखाने” से पहले “समझने” की कोशिश नहीं करते, वहाँ शिक्षा एक बोझ बन जाती है।

हर बच्चा अपने भीतर सपने, डर, जिज्ञासा और आत्मसम्मान का संसार लेकर जन्मता है। वह केवल “पढ़ने वाला” नहीं, बल्कि महसूस करने वाला प्राणी भी है। जब किसी वयस्क की असंवेदनशीलता उस संसार को चोट पहुँचाती है, तो बच्चा बाहर से मौन और भीतर से बिखर जाता है।

मनोवैज्ञानिक कहते हैं — “बच्चे की चुप्पी हमेशा उसकी गलती नहीं होती, कभी-कभी वह हमारी असफलता का आईना होती है।”

बाल मनोविज्ञान यह सिखाता है कि हर व्यवहार के पीछे एक कारण होता है। कभी बच्चे की जिद्द के पीछे डर होता है, कभी आलस्य के पीछे आत्म-संदेह, कभी गुस्से के पीछे उपेक्षा की चुभन।

अगर शिक्षक और माता-पिता इन संकेतों को पढ़ना सीख जाएँ, तो डाँट की जगह संवाद और सज़ा की जगह समझ अपना स्थान ले सकती है।

शिक्षक केवल पाठ नहीं पढ़ाते, वे भविष्य गढ़ते हैं। उनके शब्द बच्चे के जीवन में गूंजते रहते हैं — “तुमसे कुछ नहीं होगा” — यह वाक्य किसी बच्चे के आत्मविश्वास की मृत्यु बन सकता है। जबकि “मुझे तुम पर गर्व है” — वही वाक्य उसके सपनों को उड़ान दे सकता है।

इसलिए शिक्षा में सबसे पहले जरूरी है संवेदनशील संवाद।

ये संवाद केवल स्कूल में ही नहीं बल्कि घर में भी होना चाहिए। घर वह जगह होनी चाहिए जहाँ बच्चा अपने डर, गलती या असफलता के बारे में खुलकर बात कर सके। पर अक्सर घर में तुलना, अपेक्षाएँ और डाँट का माहौल उसे और भीतर धकेल देता है। बच्चे को “सर्वश्रेष्ठ” नहीं बनाना बल्कि “समझा हुआ” महसूस कराना है। ये ही सच्ची परवरिश है।

ऐसे सुधार जो आवश्यक है हर विद्यालय के लिए:-

• शिक्षक प्रशिक्षण में बाल मनोविज्ञान को अनिवार्य किया जाए।

• हर विद्यालय में काउंसलर या मनोवैज्ञानिक की व्यवस्था हो।

• अभिभावकों के लिए संवाद कार्यशालाएँ आयोजित हों।

• और सबसे महत्वपूर्ण — हम सब यह मानें कि शिक्षा का लक्ष्य केवल अंक नहीं, इंसान बनाना है।

वो बच्चा जो घर से भागा, वो किसी गलत राह की तलाश में नहीं था — वो बस समझ और सहानुभूति की तलाश में निकला था।

अगर हम समय रहते उसके मन की भाषा पढ़ लेते, तो शायद वह कभी भागता नहीं।

आइए, शिक्षा को फिर से संवेदना से जोड़ें — क्योंकि किसी बच्चे का मौन ही संसार का सबसे बड़ा सन्नाटा है।

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